पलायन के विरुद्ध एक मौन क्रांति

विपिन जोशी,स्वर स्वतंत्र न्यूज़

कत्यूर महोत्सव: विरासत का शंखनाद

मेले की चकाचौंध के बीच स्वरोजगार की गूँज: संतोष और शिव दत्त की प्रेरणादायी कहानी

कत्यूर घाटी में इन दिनोंकत्यूर महोत्सवकी धूम है। मेले के इस शोरगुल और सांस्कृतिक उल्लास के बीच कुछ ऐसी आवाजें भीसुनाई दे रही हैं, जो उत्तराखंड के पहाड़ों में पलायन और बेरोजगारी के अंधेरे को चीरकर उम्मीद की नई किरण दिखा रही हैं। यहकहानी है दो अलगअलग पीढ़ियों के उन सारथियों की, जिन्होंने मिट्टी को सोना बनाना सीखा है।

शिव दत्त: 80 की उम्र और 40 साल का अटूट संघर्ष

जीवन के आठ दशक देख चुके शिव दत्त आज उन युवाओं के लिए एक जीवंत मिसाल हैं, जो काम की तलाश में शहरों की ओर भागरहे हैं। पिछले 40 वर्षों से सब्जी उत्पादन को अपना जुनून बना चुके शिव दत्त आज भी सालाना डेढ़ लाख रुपये तक की आय अर्जितकर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि लोबांज क्षेत्र में मटर, गोभी, गाजर और गड़ेरी जैसी फसलों की शुरुआत उन्होंने ही की थी। शिव दत्त कहते हैं,

मैंने पंतनगर से उन्नत बीज मंगाकर वैज्ञानिक और पारंपरिक विधि का मेल किया। आज खुशी इस बात की है कि मेरा पूरा गांवसब्जी उत्पादन से जुड़ा है। अगर लगन हो, तो कत्यूर घाटी की इस मिट्टी में जैविक खेती का बहुत बड़ा कारोबार खड़ा किया जासकता है।

सुनील : शिक्षा के बाद मिट्टी से जुड़ा युवा जोश

वहीं दूसरी ओर, युवा किसान सुनील एक आधुनिक सोच के साथ खेती को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। उच्च शिक्षा और नौकरी की तैयारियों के साथ उनके पास भी शहर जाकर नौकरी करने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने जोखिम भरा मगर स्वाभिमानी रास्ता चुना—’अपनी मिट्टी से जुड़ाव

सुनील ने बहुआयामी और उन्नत कृषि को जैविक तरीकों से विकसित किया है। वे बताते हैं, सब्जी के साथ मुर्गी पालन को भी बढ़ावा दिया ।

शुरुआत में डर था, लेकिन जब स्थानीय बाजार में जैविक सब्जियों की मांग बढ़ी, तो मेरा हौसला भी बढ़ गया। आज कत्यूर महोत्सवजैसे मंचों पर स्टॉल लगाने का उद्देश्य यही है कि अन्य शिक्षित युवा भी स्वरोजगार के इस मॉडल को समझें और इसे अपनाएं।

पलायन के विरुद्ध एक मौन क्रांति

कत्यूर महोत्सव में लगे इन स्टॉल्स पर केवल जैविक सब्जियां हैं, बल्कि पहाड़ की जवानी और पानी को पहाड़ में ही रोकने का एकमजबूत संदेश भी है। जहाँ शिव दत्त का अनुभव यह बताता है कि उम्र केवल एक संख्या है, वहीं सुनील की सफलता यह साबित करतीहै कि खेती को अगर उन्नत और जैविक तरीके से किया जाए, तो यह किसी भी कॉर्पोरेट नौकरी से बेहतर करियर हो सकता है।

इन दोनों किसानों की यह जुगलबंदी हमें सिखाती है कि स्वरोजगार की राह कठिन जरूर है, लेकिन जब इरादे पहाड़ जैसे मजबूत हों, तो बेरोजगारी का दैत्य बौना पड़ जाता है। आज लोबांज के ये दो किसान कत्यूर घाटी के असलीब्रांड एंबेसडरबनकर उभरे हैं।

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