विपिन जोशी..
कर्णप्रयाग-बागेश्वर रेल लाइन के लिए सीएम धामी की पहल, जगी उम्मीदों की नई किरण
देहरादून/बागेश्वर: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और कुमाऊं-गढ़वाल को रेल सेवा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्रीय रेल मंत्री से कर्णप्रयाग-बागेश्वर रेल लाइन के ‘फाइनल लोकेशन सर्वे’ (FLS) की स्वीकृति की पुरजोर मांग की है। सीएम की इस सक्रियता के बाद क्षेत्रीय जनता और रेल लाइन संघर्ष समिति में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
इस महत्वपूर्ण कदम का स्वागत करते हुए ‘कर्णप्रयाग-बागेश्वर रेल लाइन संघर्ष समिति’ के अध्यक्ष नंदन सिंह अल्मिया ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह रेल लाइन मात्र एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि कुमाऊं और गढ़वाल के सांस्कृतिक मिलन का सेतु बनेगी।
समिति के अनुसार, इस रेल लाइन के निर्माण से:• लाखों लोगों को लाभ: दुर्गम क्षेत्रों के निवासियों को सस्ती और सुलभ यातायात सुविधा मिलेगी।• पलायन पर रोक: रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जिससे पहाड़ से हो रहे पलायन की गंभीर समस्या का स्थायी समाधान संभव हो सकेगा।• आर्थिक विकास: पर्यटन और स्थानीय उत्पादों के बाजार तक पहुंच आसान होगी।
मुख्यमंत्री धामी ने क्षेत्रवासियों की वर्षों पुरानी मांग का सम्मान किया है। रेल लाइन आने से पहाड़ की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलेगी।”
— नंदन सिंह अल्मिया, अध्यक्ष (संघर्ष समिति)
पर्यावरणविदों का ओपिनियन: हिमालय का सीना और रेल की पटरियाँ—विकास या विनाश का जोखिम?
हिमालय केवल पत्थर और मिट्टी का ढेर नहीं है; यह एक जीवित, धड़कती हुई और निरंतर बदलती हुई संरचना है। जब हम कर्णप्रयाग-बागेश्वर रेल लाइन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की बात करते हैं, तो हमें दो विपरीत ध्रुवों को साथ लेकर चलना होता है: एक तरफ दुर्गम पहाड़ों में कनेक्टिविटी की ‘लाइफलाइन’ और दूसरी तरफ हिमालय का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
1. भू-वैज्ञानिक संवेदनशीलता (Geological Sensitivity)
उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट’ (MCT) के करीब है, जो भूकंपीय रूप से अत्यधिक सक्रिय क्षेत्र (Zone 5) में आता है।• सुरंग प्रणाली का प्रभाव: आधुनिक रेल लाइनें 80-90% सुरंगों के भीतर से गुजरती हैं। हालांकि सुरंगें सड़क काटने की तुलना में भूस्खलन का खतरा कम करती हैं, लेकिन भारी ब्लास्टिंग और खुदाई से चट्टानों के बीच का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता पहाड़ों के भीतर मौजूद जल-शिराओं (Aquifers) की है। सुरंग निर्माण के दौरान कई बार ये प्राकृतिक जल स्रोत कट जाते हैं, जिससे ऊपर बसे गाँवों में पानी का संकट पैदा हो जाता है।
आज की तकनीक (जैसे NATM – New Austrian Tunnelling Method) पुरानी तकनीकों से कहीं अधिक सुरक्षित है। इन विधियों में ब्लास्टिंग के बजाय ड्रिलिंग और ‘रॉक बोल्टिंग’ का उपयोग होता है, जो पहाड़ की मजबूती को बनाए रखता है। रेलवे का तर्क है कि रेल मार्ग बनने से सड़कों पर भारी वाहनों का दबाव कम होगा, जिससे पहाड़ों में कटिंग और उससे होने वाला भूस्खलन कम होगा।
पहाड़ों की ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) सीमित है। रेल लाइन के निर्माण के दौरान निकलने वाले मलबे (Muck) का निस्तारण सबसे बड़ी चुनौती है। यदि इस मलबे को अलकनंदा, पिंडर या सरयू जैसी नदियों में डाला गया, तो यह भविष्य में भीषण बाढ़ का कारण बन सकता है, जैसा हमने पहले भी कई बार अनुभव किया है।
क्या उत्तराखंड की पहाड़ियाँ इसे सहन कर सकती हैं? प्रोजेक्ट के दौरान होने वाली हर गतिविधि का स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक ऑडिट होना चाहिए। पर्यावरण-मित्र तकनीक भारी मशीनों के बजाय ऐसी तकनीक का उपयोग हो जो पहाड़ में कंपन कम पैदा करे। संघर्ष समिति और स्थानीय निवासियों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट के ‘पर्यावरण रक्षक’ के रूप में साथ लेना होगा।
अंततः, कर्णप्रयाग-बागेश्वर रेल लाइन कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, लेकिन इसकी कीमत हमारे जंगलों और ग्लेशियरों के विनाश से नहीं चुकाई जानी चाहिए। विकास ऐसा हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए रेल की पटरी भी हो और हिमालय की हरियाली भी।




