Home » बड़ी खबर » माहवारी का वैज्ञानिक सच वाया सोमेश्वर

माहवारी का वैज्ञानिक सच वाया सोमेश्वर

 

माहवारी का वैज्ञानिक सच और सामाजिक विडंबना: सोमेश्वर की घटना पर विशेष आलेख

विपिन जोशी 

​उत्तराखंड के सोमेश्वर बाजार में माहवारी के दौरान एक युवती को निजी रेस्टोरेंट संचालक द्वारा शौचालय का इस्तेमाल न करने देने और सार्वजनिक शौचालय पर ताला लटके मिलने की घटना केवल एक बुनियादी सुविधा के अभाव का मामला नहीं है। यह घटना हमारे समाज की उस रूढ़िवादी मानसिकताओं और अंधविश्वास पर करारा तमाचा है, जो आज भी माहवारी जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रिया को “छुआछूत” या “अपवित्रता” से जोड़कर देखती है।

​जिस दौर में हम एआई (AI), अंतरिक्ष अभियानों और दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्था बनने का दावा कर रहे हैं, उस दौर में एक महिला को माहवारी के दौरान एक अदद स्वच्छ शौचालय न मिलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

​माहवारी: कोई अभिशाप नहीं, केवल एक जैविक प्रक्रिया

​विज्ञान के दृष्टिकोण से माहवारी पूरी तरह से एक प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया है। समाज में इसे लेकर फैले भ्रम और विज्ञान के सच को समझना बेहद जरूरी है:

​जैविक चक्र, माहवारी हर महीने होने वाला वह चक्र है जो एक महिला के शरीर को भावी गर्भावस्था के लिए तैयार करता है। यह किसी बीमारी, पाप या छुआछूत का संकेत नहीं है।

​हार्मोनल बदलाव, मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोनों के स्राव से यह प्रक्रिया नियंत्रित होती है।

​गर्भाशय की परत का झड़ना जब अंडाणु निषेचित नहीं होता, तो गर्भाशय की अंदरूनी परत और रक्त शरीर से बाहर निकल जाता है। यह शरीर की एक सामान्य सफाई प्रक्रिया है।

​संक्रमण और स्वच्छता का खतरा: माहवारी के दौरान साफ-सफाई और सही समय पर पैड या शौचालय की सुविधा न मिलना महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जानलेवा हो सकता है। दूषित स्थिति में रहने से और गर्भाशय से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

​वैज्ञानिक युग में डाकियानूसी सोच का दंश

​सोमेश्वर की घटना में रेस्टोरेंट संचालक द्वारा मनाही और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की बदहाली यह दर्शाती है कि समाज आज भी वैज्ञानिक तथ्यों से आंखें मूंदे बैठा है। माहवारी को छुआछूत मानना न केवल अज्ञानता है, बल्कि यह महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों का हनन भी है। जब शरीर को सबसे ज्यादा स्वच्छता और देखभाल की जरूरत होती है, तब समाज उन्हें तिरस्कार और असुविधा की तरफ धकेल देता है।

​प्रशासनिक दावों पर उठते सवाल

​सोमेश्वर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वयं प्रदेश की महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्री रेखा आर्या करती हैं। उनके अपने गृह क्षेत्र के मुख्य बाजार में महिलाओं के लिए एक कार्यात्मक और सुरक्षित शौचालय का न होना सरकारी तंत्र की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

​राजनीतिक स्तर पर भले ही भूमि आवंटन न होने या ₹40 लाख की स्वीकृति की बात कही जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी जरूरतों के अभाव का खामियाजा आम महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। यदि कस्बों और मुख्य बाजारों का यह हाल है, तो दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

​बदलाव की आवश्यकता

​माहवारी पर चुप्पी तोड़ना और वैज्ञानिक सोच को अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है:

​सख्त नीतियां व बुनियादी ढांचा: सभी सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों पर महिलाओं के लिए स्वच्छ और क्रियाशील शौचालयों की अनिवार्यता सुनिश्चित की जाए।

​सामाजिक जागरूकता: माहवारी से जुड़े अंधविश्वासों को खत्म करने के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति या व्यापारी किसी महिला को ऐसी स्थिति में सहायता देने से इनकार न करे।

​वैज्ञानिक शिक्षा: स्कूलों और समुदायों में माहवारी के जैविक तथ्यों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए ताकि इसे “अपवित्रता” के बजाय “जीवन की नींव” के रूप में देखा जा सके।

​जब तक समाज माहवारी को प्राकृतिक सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करता और सरकारें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में तत्परता नहीं दिखातीं, तब तक प्रगतिशीलता के तमाम दावे अधूरे ही रहेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *