हिमालयी चेतावनी: नदियाँ बाँधने की भूल और नेपाल-उत्तराखंड आपदा का सच.
विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र
नेपाल में आई हालिया आपदा बेहद दुखद है। कुछ समय पहले उत्तराखंड के हर्शील में आई आपदा की तस्वीरें भी लोगों ने देखी थीं। जनसंचार के इस युग में मानव त्रासदियों की झलकियां मिनटों में संसार भर में फैल जाती हैं। सोशल मीडिया पर हर कोई, जिसकी थोड़ी-बहुत फ़ॉलोइंग है, अपने-अपने विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा है। मालूम नहीं कौन कितना तार्किक है।
सच्चाई यह है कि हज़ारों लोगों ने अपने निकट संबंधियों को इन आपदाओं में खो दिया है। सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। उनके अपने लोग फ़ोन की हर घंटी पर अपने खोए हुए प्रियजनों की आवाज़ सुनने के लिए दौड़ पड़ते हैं। मालूम नहीं कितने लोगों की आँखों में ये घंटियाँ खुशियों के आँसू लेकर आती हैं और कितनों के हिस्से सिर्फ़ सन्नाटा आता है।
नेपाल आपदा का ताज़ा घटनाक्रम:
नेपाल-चीन सीमा के पास लांगटांग राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र (लेंडे खोला और त्रिशूली नदी घाटी) में हिमनद (ग्लेशियर) टूटने व भारी भूस्खलन के कारण आई अचानक बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई है। इस त्रासदी में अब तक 500 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 2,000 से अधिक लोग लापता हैं। रसुवागढ़ी सीमा चौकी, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और कई पुलों के बह जाने से राहत एवं बचाव कार्य में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में कई विदेशी नागरिक व तीर्थयात्री भी फँसे हुए हैं।
इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं खुद से सवाल पूछता हूँ कि मानव अतीत में इस तरह की कितनी भयानक आपदाएँ दर्ज हैं?
गढ़वाल हिमालय में पिछले 800 वर्षों में अलकनंदा-मंदाकिनी नदी घाटी में 12 बड़ी आपदाओं का उल्लेख मिलता है।
1893-94 में अलकनंदा नदी बेसिन की बिरही गंगा में भारी भूस्खलन की वजह से गोहना ताल बन गया था, जो 1894 में टूट गया। इसके कारण अलकनंदा में भयंकर बाढ़ आई, जिसमें अलकनंदा का जलस्तर लगभग 10 मीटर तक बढ़ गया था। इस वजह से तत्कालीन गढ़वाल श्रीनगर पूरी तरह तहस-नहस हो गया था। एक अनुमान के अनुसार, इस झील से लगभग 53,000 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड की दर से पानी का निकास (डिस्चार्ज) हुआ था।
इसी तरह की एक अन्य त्रासदी 1970 में अलकनंदा नदी घाटी में आई थी। वहीं, 2013 की केदारनाथ आपदा की स्मृति लोगों के ज़ेहन में आज भी ताज़ा होगी।
इसी प्रकार, भारी हिमस्खलन के चलते 1985 और 1998 के बीच नेपाल में भी तीन बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ दर्ज की गईं।
यहाँ इन तथ्यों को रखने के पीछे मेरा आशय इस बात की तरफ ध्यान खींचना है कि हमारा पूरा हिमालयी क्षेत्र भू-आपदाओं के लिहाज़ से अत्यंत संवेदनशील है। औद्योगिक युग में संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने संभवतः इन खतरों को बढ़ा दिया है। परंतु अत्यधिक सरलीकृत व्याख्याएँ—जैसे ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ जैसी अवधारणाओं को आए-बाएँ हर आपदा के बीच में ले आना—लोगों की समझ में कोई खास इज़ाफ़ा नहीं करतीं। खास तौर पर उन पहाड़ी लोगों की समझ में, जो इस या उस किसी भी ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं हैं।
पहाड़ी लोगों को चाहिए कि वे नदी के किनारों पर बड़े-बड़े भवन न बनाएँ। अतीत में पहाड़ी लोग नदियों से दूर अपने गाँव बसाते थे। मेरी दादी कहती थीं कि ‘गाड़’ (नदी/गधेरे) के पास कोई अपनी बेटी नहीं व्याहना चाहता था। यह जो धर्म के नाम पर पर्यटन या पर्यटन के नाम पर धर्म परोसा जा रहा है, इसके दूरगामी खतरों को समय रहते महसूस करने की आवश्यकता है।
नदी से सुरक्षित दूरी बनाए रखें; इसे नियंत्रित करने या बाँधने की ज़बरदस्ती कोशिशें भयानक परिणाम लाने वाली साबित होंगी।
स्कूलों की पाठ्यचर्या को नए सिरे से देखने की ज़रूरत है। ये प्राकृतिक आपदाएँ हमें निरंतर कुछ संकेत दे रही हैं; इन्हें गहराई से समझने की आवश्यकता है। हमें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत है, जो रटने के बजाय विचार करना सिखाए।

















