खुंट में रेशम क्रांति: पं. पंत की जन्मस्थली से ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0’ का शंखनाद
अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पारंपरिक आजीविका को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हुई है। केंद्रीय रेशम बोर्ड (वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार) के राष्ट्रीय अभियान ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान (MRMA) 2.0’ के तहत 22 अगस्त 2026 को अल्मोड़ा जनपद के ऐतिहासिक गांव खुंट में ‘वैज्ञानिक–रेशम कृषक संवाद’ कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।
क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र (RSRS), सहसपुर (देहरादून) एवं रेशम निदेशालय, उत्तराखंड के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक रेशम उत्पादन तकनीकों का हस्तांतरण और कृषकों की आय में वृद्धि करना रहा।
श्रद्धांजलि और पर्यावरण संवर्धन से शुरुआत
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जन्मस्थली खुंट स्थित उनके स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके पश्चात उनके पैतृक परिसर के समीप शहतूत के पौधों का रोपण किया गया, जो क्षेत्र में सतत आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के नए युग का प्रतीक बना।
प्रमुख बिंदु एवं भागीदारी:
गरिमापूर्ण उपस्थिति: कार्यक्रम में NEHIR के अध्यक्ष श्री आर. डी. जोशी तथा जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (GBPNIHE) के वैज्ञानिक-ई डॉ. अशोक साहनी की गरिमामयी मौजूदगी रही।
व्यापक जनभागीदारी: खुंट, धमास, भाकड़, नौला, सल्ला, शीतलाखेत और देवलीखान गांवों के 53 रेशम उत्पादक किसानों ने कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
प्रभावी समन्वय: रेशम निदेशालय की डॉ. अनीता मेहरा ने कार्यक्रम का कुशल समन्वय करते हुए वैज्ञानिकों और कृषकों के बीच जीवंत संवाद स्थापित किया।
तकनीकी सत्र: शहतूत प्रबंधन से लेकर कीटपालन तक
RSRS सहसपुर के प्रमुख एवं वैज्ञानिक-डी डॉ. पवन सैनी ने अभियान के दूरगामी लक्ष्यों पर प्रकाश डालते हुए कृषकों को वैज्ञानिक तकनीकों से रूबरू कराया:
शहतूत बागान प्रबंधन: पौधशाला तैयार करने, रोपण, सिंचाई, जैविक उर्वरक प्रबंधन, छंटाई और पत्तियों के उचित रखरखाव की वैज्ञानिक विधियों की जानकारी दी गई।
कीटपालन की आधुनिक पद्धतियां: कीटपालन गृह व उपकरणों का विसंक्रमण (Disinfection), मोल्ट प्रबंधन, रोग नियंत्रण हेतु बेड डिसइन्फेक्टेंट व चूने का सटीक प्रयोग तथा कोया (Cocoon) निर्माण की सही अवस्था की पहचान पर विस्तृत चर्चा हुई।
समस्या का ऑन-स्पॉट वैज्ञानिक समाधान
संवाद सत्र के दौरान कृषकों ने रेशमकीटों की अंतिम अवस्था में होने वाले नुकसान और फसल क्षति की गंभीर समस्या को वैज्ञानिकों के समक्ष रखा। लक्षणों का विश्लेषण करते हुए डॉ. सैनी ने इसे ग्रैसरी रोग (Grasserie Disease) के रूप में चिन्हित किया। उन्होंने कृषकों को कीटपालन गृह में स्वच्छता, तापमान व आर्द्रता के संतुलन तथा रोग-निवारक उपायों को अपनाने की त्वरित सलाह दी।
खेतों का निरीक्षण और आगामी रणनीति
कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. सैनी ने कृषकों के खेतों में जाकर शहतूत बागानों का जायजा लिया। उन्होंने आगामी शरदकालीन रेशमकीट पालन-2026 की तैयारियों की समीक्षा की और पत्ती की गुणवत्ता में सुधार व कोया उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट तकनीकी सुझाव दिए।
यह आयोजन केवल एक औपचारिक संवाद न रहकर, पर्वतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वैज्ञानिक दिशा देने और ‘स्वावलंबी उत्तराखंड’ की नींव को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ।




















