अफौं गाँव में ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0’ के तहत जागरूकता कार्यक्रम: वैज्ञानिकों से सीखे रेशमकीट पालन और रोग प्रबंधन के गुर
अल्मोड़ा, 19 अगस्त 2026
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद अंतर्गत स्याल्दे ब्लॉक स्थित अफौं गाँव में ‘वैज्ञानिक रेशमकीट पालन पद्धतियाँ’ विषय पर एक दिवसीय जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम केंद्रीय रेशम बोर्ड (वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार) के राष्ट्रीय अभियान “मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0” (MRMA 2.0) के अंतर्गत आयोजित किया गया।
क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र (RSRS), सहसपुर, देहरादून और रेशम निदेशालय (DoS), उत्तराखंड के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में गाँव के 21 उत्साही रेशम पालकों ने भाग लिया।
गाँव में नई आजीविका और ग्राम प्रधान का प्रयास
अफौं गाँव के किसानों ने वसंत ऋतु 2024 से शहतूत आधारित रेशमकीट पालन शुरू किया था। वर्तमान में किसान प्रति फसल लगभग 9–14 किलोग्राम शहतूती रेशम कोकून का उत्पादन कर रहे हैं। गाँव के कई रेशम पालक केंद्रीय रेशम बोर्ड की ‘सिल्क समग्र’ योजना से भी लाभान्वित हुए हैं।
इस बदलाव में गाँव के प्रधान श्री अनूप सिंह रावत की भूमिका सराहनीय रही है। देहरादून की सुविधाजनक जीवनशैली छोड़कर गाँव लौटे श्री रावत ने स्वयं रेशमकीट पालन अपनाया और ग्रामीणों को भी प्रेरित किया। ग्रामीण क्षेत्र में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए RSRS सहसपुर के वैज्ञानिक-डी एवं प्रमुख डॉ. पवन सैनी ने ग्राम प्रधान को MRMA 2.0 स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया।
वैज्ञानिकों और किसानों के बीच सीधा संवाद
डॉ. पवन सैनी ने जानकारी दी कि केंद्रीय वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह द्वारा शुरू किए गए इस राष्ट्रीय अभियान का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिकों और किसानों के बीच सीधा संवाद स्थापित कर तकनीकी समाधान पहुँचाना है।
आगामी शरद रेशमकीट पालन फसल-2026 को ध्यान में रखते हुए आयोजित तकनीकी सत्र में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर मार्गदर्शन दिया गया:
पालन एवं बागान प्रबंधन: शहतूत बागान प्रबंधन से लेकर कोकून उत्पादन, छंटाई और विपणन की विस्तृत जानकारी।
तकनीकी बारीकियाँ: तृतीय अवस्था से आगे की कीट पालन तकनीक, तापमान और आर्द्रता प्रबंधन, तथा मोल्ट (केंचुल बदलने की अवस्था) की पहचान।
रोग नियंत्रण व रोकथाम: ‘विजेता’ (Vijetha) और बुझे हुए चूने (Slaked Lime) का वैज्ञानिक उपयोग, विशेष रूप से चौथी और पाँचवीं अवस्था के दौरान।
ग्रासरी रोग और पाउडरी मिल्ड्यू पर विशेष चर्चा
संवाद के दौरान किसानों ने शहतूत में पाउडरी मिल्ड्यू तथा रेशमकीटों में ‘ग्रासरी रोग’ की समस्या को प्रमुखता से उठाया। किसानों ने बताया कि अंतिम अवस्था में कोकून बनाने से ठीक पहले कीट रोगग्रस्त हो जाते हैं। डॉ. सैनी ने लक्षणों के आधार पर ग्रासरी रोग के कारण, रोकथाम और प्रबंधन के तरीके विस्तार से समझाए।
कार्यक्रम को सफल बनाने में रेशम निदेशालय (स्याल्दे) के निरीक्षक श्री मनीष कुमार, श्री ध्यान सिंह और श्री जगदीश कुमार का विशेष योगदान रहा। इस आयोजन ने नवोदित रेशम पालकों को वैज्ञानिक पद्धतियाँ अपनाकर बेहतर उत्पादन और आय में वृद्धि करने का व्यावहारिक मार्ग दिखाया है।




















