विपिन जोशी…
फुलवाड़ी-खाईधार: ‘आजादी के दशकों बाद भी सड़क नहीं, तो कैसा विकास?’—छलावे और बहानों के खिलाफ फूटा जनता का आक्रोश!
स्वतंत्रता दिवस का जश्न जहां पूरा देश मना रहा है, वहीं फुलवाड़ी, फुलाचौंरा, थलीधार, खाईंधार और ठांग धार की संघर्षरत जनता आज भी अपने बुनियादी हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर है। स्वतंत्रता का असल मतलब केवल कागजी बातें नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन और विकास की वो मुख्य धारा है जो ‘सड़क’ के रूप में हर गांव तक पहुंचे। लेकिन आंसुओं और संघर्ष की इस धरती पर ‘जनता के भाग्यविधाता’ पूरी तरह मौन हैं!
यह कोई रातों-रात खड़ा हुआ गुस्सा नहीं है, बल्कि सालों से बोले जा रहे झूठ, हवा-हवाई वादों और सिस्टम की ओर से मिले लगातार धोखे का लावा है जो अब सड़कों पर बह निकलना चाहता है। जनता का सीधा संदेश है: **”अब और छलावा नहीं! मांगें कागजों पर नहीं, धरातल पर चाहिए।”
आचार संहिता भी नहीं रोक पाएगी जनता का बुलंद हौसला –
सिस्टम अगर यह सोच रहा है कि चुनावी आचार संहिता का बहाना बनाकर इस आंदोलन को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। संघर्ष समिति ने साफ ऐलान कर दिया है:
तरीका बदलेगा, पर तेवर नहीं: अगर आचार संहिता के कारण सड़कों पर धरना रुका, तो आंदोलन हर नागरिक के घर के भीतर पहुंचेगा।
हर घर बनेगा आंदोलन स्थल: ग्रामीण अपने-अपने घरों पर बैनर लगाकर सांकेतिक रूप से ‘क्रमिक अनशन’ जारी रखेंगे।
अंतिम सांस तक संघर्ष: जब तक पहली कुदाल जमीन पर नहीं पड़ेगी और सड़क धरातल पर नहीं दिखेगी, तब तक यह लड़ाई न रुकेगी, न झुकेगी।
पूछती है जनता – कब जागेगा जिम्मेदार हुक्मरान?
रोजमर्रा की जिंदगी में गांव वालों द्वारा झेला जा रहा यह दर्द अब आक्रोश की ज्वाला बन चुका है। अपनी ही बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती यह जनता पूछ रही है आखिर कब तक उनके धैर्य की परीक्षा ली जाएगी?जब तक जमीन पर डामर नहीं बिछ जाता, तब तक फुलवाड़ी-खाईधार की हुंकार गूंजती रहेगी।
जय हिंद! जय सड़क संघर्ष समिति!


















