Home » Uncategorized » ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे परियोजना: विकास बनाम पर्यावरण का संघर्ष

ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे परियोजना: विकास बनाम पर्यावरण का संघर्ष

एक ओर सरकार एक पेड़ माँ के नाम अभियान पर करोड़ो खर्च कर रही है , पर्यावरण संरक्षण का स्वांग रच रही है वहीं विकास के नाम पर सैकड़ों साल पुराने पेड़ों को कटवा रही है, विरोध करने वालों पर पुलिस का अत्याचार और पत्रकारों का उत्पीड़न भी साथ में चल रहा है। इस मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर एक हल चल बना दी है । उत्तराखंड में हरियाली का त्योहारहरेलामनाया जाता है, लेकिन इसबार प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों की कटाई के विरोध में इसेब्लैक हरेलाकाला दिवस के रूप में मनाया।

विकास के लिए पेड़ों की बलि क्यों
विकास के लिए पेड़ों की बलि क्यों

उत्तराखंड के देहरादूनऋषिकेश नेशनल हाईवे एनएच-07 पर भानियावाला से ऋषिकेश के बीच प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरणपरियोजना इन दिनों बड़े पर्यावरणीय विवाद और जनआंदोलन का केंद्र बनी हुई है। इस परियोजना के अंतर्गतसात मोड़क्षेत्र मेंहजारों पुराने पेड़ों का कटान शुरू हो चुका है, जिसके विरोध में स्थानीय निवासियों, पर्यावरणविदों और युवाओं ने मोर्चा खोल दिया है।

भानियावालाजॉलीग्रांटऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना का हिस्सा है, जिसकी लागत लगभग 743 करोड़ रुपये है। भारतीयराष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अनुसार, इस परियोजना के लिए 4,369 पेड़ों को काटने और 754 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने कीयोजना है। उक्त क्षेत्र शिवालिक वन क्षेत्र और राजाजी टाइगर रिजर्व के लैंडस्केप का हिस्सा है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि यहक्षेत्र हाथियों के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर है, पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाएगा और पर्यावरणीय संकट भी पैदा होगा।

‘चिपको’ आंदोलन की तर्ज पर प्रदर्शनकारी पेड़ों को गले लगाकर और उनके सामने खड़े होकर कटाई को रोकने का प्रयास कर रहेहैं, जो उत्तराखंड के ऐतिहासिकचिपको आंदोलनकी याद दिलाता है। इस आंदोलन मेंजेनजीऔर युवा पीढ़ी की सक्रियभागीदारी देखी जा रही है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठा रहे हैं। पुलिस उत्पीड़न का भी आंदोलनकारी खुल कर विरोध कर रहे हैं ।

इस मामले में हाई कोर्ट में अवमानना याचिका खारिज होने के बाद, अब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, जहां से तुरंत रोक लगानेकी मांग की गई है।

प्रशासन और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का कहना है कि परियोजना का निष्पादन विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसितमिटिगेशन उपायोंके अनुसार किया जा रहा है, विशेष रूप से हाथीकॉरिडोर को ध्यान में रखते हुए। अधिकारियों का तर्क है कि विकास कार्य के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखने की पूरीकोशिश की गई है और वे न्यायालय के आदेशों का पालन कर रहे हैं।

परन्तु हजारों पेड़ों की कटाई के बाद पर्यावरण को नुकसान तो पहुंचेगा उसकी भरपाई कैसे करेगी सरकार ? क्या सरकार पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है ? यह संघर्ष केवल पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्किसतत विकासकी परिभाषा को लेकर है। स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों कामानना है कि सड़क की क्षमता बढ़ाने के नाम पर सदियों पुराने पेड़ों की बलि देना अनुचित है, जबकि प्रशासन इसे सामरिक औरपरिवहन की दृष्टि से आवश्यक बता रहा है। फिलहाल, विकास की गति और प्रकृति के संरक्षण के बीच का यह संतुलन एक बड़ीबहस का विषय बना हुआ है।

विपिन जोशी, संपादक स्वर स्वतंत्र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *