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एक पेड़ माँ के नाम हज़ारों पेड़ कंपनी के नाम

विपिन जोशी…
देहरादून ऋषिकेश रोड चौड़ी करने के लिए 4000 पेड़ काटे।
20 मिनट पहले पहुंचने के लिए 4000 पेड़ काटे जाएंगे
उत्तराखंड में ऋषिकेश जाने के लिए सड़क चौड़ीकरण के नाम 3,000 से 4,400 के बीच हरे भरे वृक्षों की दर्दनाक कटाई चल रही है। जबकि वहां अच्छी खासी चौड़ी सड़क पहले से ही है।
उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संतुलन के बीच की बहस एक बार फिर चर्चा में है। देहरादून-ऋषिकेश मार्ग के चौड़ीकरण को लेकर सोशल मीडिया और जनमानस में चिंताएं जताई जा रही हैं।
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, नदियों और समृद्ध जंगलों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे के तेजी से हो रहे विकास ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। ताजा मामला देहरादून-ऋषिकेश मार्ग का है, जहां सड़क चौड़ीकरण की योजना के तहत हजारों पेड़ों की कटाई को लेकर स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों में गहरी चिंता और आक्रोश देखा जा रहा है।
20 मिनट के सफर के लिए 4000 पेड़ों की बलि?
प्राप्त जानकारी और सोशल मीडिया पर चल रही बहसों के अनुसार, इस मार्ग को चौड़ा करने के पीछे का मुख्य उद्देश्य यात्रा के समय में महज 20 मिनट की बचत करना बताया जा रहा है। लेकिन इस थोड़े से समय को बचाने की कीमत पर्यावरण को गंभीर रूप से चुकानी पड़ रही है। दावों के मुताबिक, इस परियोजना के लिए 3,000 से लेकर 4,400 हरे-भरे वृक्षों की कटाई की जा रही है।
स्थानीय लोगों और यात्रियों का यह भी तर्क है कि देहरादून से ऋषिकेश के बीच पहले से ही एक अच्छी-खासी चौड़ी सड़क मौजूद है। ऐसे में इस चालू और बेहतर सड़क को और अधिक चौड़ा करने के लिए इतने बड़े पैमाने पर जंगलों को उजाड़ना समझ से परे नजर आता है।
यह मुद्दा इसलिए भी अधिक संवेदनशील हो गया है क्योंकि एक तरफ जहां सरकारी और सामाजिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे बड़े अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी ढांचा तैयार करने वाली कंपनियों और विकास परियोजनाओं के नाम पर हजारों पुराने और मजबूत पेड़ों को काट दिया जाता है। आम जनता के बीच यह विरोधाभास गहरी निराशा पैदा कर रहा है। लोगों का मानना है कि नए पौधे लगाना बेहद जरूरी है, लेकिन वे दशकों पुराने उन पेड़ों का विकल्प तुरंत नहीं बन सकते जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को संभाले हुए हैं।
ऋषिकेश और देहरादून का यह क्षेत्र संवेदनशील शिवालिक पहाड़ियों के करीब है। यहाँ बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटने से कई गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं:
हरे-भरे पेड़ों के कटने से स्थानीय तापमान में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। इनकी कमी से बारिश के दिनों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
यह क्षेत्र प्राकृतिक जल स्रोतों (जैसे नौले और धारे) के लिए जाना जाता है। जंगलों के नष्ट होने से भूमिगत जल स्तर पर बुरा असर पड़ता है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चारधाम यात्रा और स्थानीय कनेक्टिविटी के लिहाज से सड़कों का बेहतर होना जरूरी है। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो विनाश का कारण न बने। प्रशासन और नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे सड़कों को चौड़ा करते समय ‘इको-फ्रेंडली’ तकनीकों का उपयोग करें, जहां संभव हो पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें री-लोकेट किया जाए और जनता के सुझावों को भी प्राथमिकता दी जाए। समय की मांग है कि हम 20 मिनट की जल्दबाजी के बजाय अपनी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित पर्यावरण को प्राथमिकता दें।
भारत में बुनियादी ढांचे के तेजी से होते विकास और राजमार्गों के चौड़ीकरण के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि दी गई है। विशेष रूप से संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में ऐसी कई बड़ी परियोजनाएं संचालित हुई हैं, जहां सड़क के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों का कटान हुआ और इसके गंभीर पर्यावरणीय दुष्परिणाम आज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
ऐसी ही कुछ प्रमुख राष्ट्रीय परियोजनाओं और उनके पर्यावरणीय प्रभावों पर एक अध्ययन-
1. चारधाम महामार्ग विकास परियोजना (उत्तराखंड)
यह देश की सबसे चर्चित और विवादित सड़क परियोजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ने वाले लगभग 825 से 900 किलोमीटर लंबे राजमार्गों का चौड़ीकरण करना है।
पेड़ों की कटाई: इस परियोजना के लिए देवदार, बांज और अन्य प्रजातियों के हजारों (अनुमानतः 28,000 से अधिक) पुराने पेड़ों को काटा गया है।
पर्यावरणीय असर:
अवैज्ञानिक पहाड़ी कटान और भूस्खलन: सड़कों को 10 मीटर चौड़ा करने के लिए पहाड़ियों को लंबवत काटा गया, जिससे संवेदनशील शिवालिक और मध्य हिमालयी ढलान बेहद अस्थिर हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे क्षेत्रों में बार-बार विनाशकारी भूस्खलन हो रहे हैं।
मलबे का अवैध डंपिंग – सड़क खुदाई से निकले मलबे को सीधे अलकनंदा और भागीरथी जैसी नदियों या प्राकृतिक जल स्रोतों में फेंक दिया गया। इससे नदियों का जलस्तर प्रभावित हुआ है, बाढ़ का खतरा बढ़ा है और कई पारंपरिक पेयजल स्रोत (धारे और नौले) हमेशा के लिए सूख गए हैं।
2. दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर (दिल्ली-सहारनपुर-देहरादून एक्सप्रेसवे)
दिल्ली से देहरादून के बीच यात्रा के समय को कम करने के लिए इस एक्सप्रेसवे का निर्माण किया गया है, जो राजाजी नेशनल पार्क के इको-सेंसिटिव जोन और शिवालिक वन प्रभाग से होकर गुजरता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना के लिए अकेले शिवालिक वन प्रभाग (गणेशपुर से देहरादून खंड) में 7,700 से अधिक पेड़ और 3,200 से अधिक पौधे काटे गए। कुल मिलाकर इस मार्ग पर हजारों साल पुराने ‘शाल’ के वृक्षों की बलि चढ़ी।
पर्यावरणीय असर:
वन्यजीवों के आवास का विखंडन – शाल के घने जंगल तेंदुए, बाघ और हाथियों जैसे जीवों के प्राकृतिक गलियारे रहे हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वन्यजीवों के आवास छोटे टुकड़ों में बंट गए हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं।
मिट्टी का कटाव – शिवालिक पहाड़ियों की मिट्टी बहुत रेतीली और ढीली है। शाल के पेड़ों की जड़ें इस मिट्टी को बांधकर रखती थीं, लेकिन उनके कटने से अब बारिश के दिनों में भारी मृदा अपरदन और भूस्खलन की समस्या पैदा हो रही है।
3. मुंबई-गोवा राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना
पश्चिमी घाट जैसी वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट से गुजरने वाले इस राजमार्ग को चार लेन का बनाने के लिए पिछले एक दशक से काम चल रहा है।
कोंकण क्षेत्र और पश्चिमी घाट के संवेदनशील हिस्सों में इस सड़क के लिए लाखों फलदार और जंगली पेड़ों (जैसे आम, काजू और सदाबहार वन) को काटा गया।
तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि: कोंकण का जो क्षेत्र कभी अपनी ठंडी और नम जलवायु के लिए जाना जाता था, वहां घने वनों के साफ होने से स्थानीय तापमान में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
पेड़ों की कमी और अव्यवस्थित कंस्ट्रक्शन के कारण कोंकण की नदियों (जैसे वशिष्ठी और जगबुड़ी) में मानसून के दौरान अचानक भीषण बाढ़ आने लगी है, जिसने हाल के वर्षों में महाड और चिपलून जैसे शहरों में भारी तबाही मचाई है।
4. बंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे (कर्नाटक)
कनेक्टिविटी को सुधारने के लिए हाल ही में बने इस 117 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे के निर्माण में भी बड़े पैमाने पर हरियाली को नष्ट किया गया।
इन परियोजनाओं से सीख और बड़ा सवाल
इन सभी मामलों में सरकारें ‘सहानुभूतिपूर्ण वनीकरण’ का तर्क देती हैं, यानी एक कटे पेड़ के बदले 10 नए पौधे लगाना। लेकिन पर्यावरण वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि:
काटे गए पेड़ संवेदनशील पहाड़ी ढलानों या जंगलों में होते हैं, जबकि नए पौधे कहीं दूर मैदानी इलाकों या बंजर जमीनों पर लगाए जाते हैं, जिससे प्रभावित क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाता है।
समय का अंतर: एक 50 से 100 साल पुराना शाल, देवदार या बरगद का पेड़ जितना कार्बन सोखता है, मिट्टी को बांधता है और ऑक्सीजन देता है, उसकी बराबरी नया लगाया गया एक छोटा सा पौधा अगले 30-40 सालों तक नहीं कर सकता।
यही कारण है कि आज देश में सतत और पर्यावरण-अनुकूल विकास’ की मांग उठ रही है, जहां सड़कों को चौड़ा करने के बजाय टनल, वायडक्ट या एलिवेटेड कॉरिडोर जैसी तकनीकों पर जोर दिया जाए ताकि पेड़ों को न्यूनतम नुकसान पहुंचे।

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