विपिन जोशी…
बयालीसेरा/तैलीहाट। गोमती नदी में नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे खनन ने एक सरकारी लघु सिंचाई परियोजना को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। नदी के जलस्तर में मामूली वृद्धि के साथ ही खनन से बदले नदी के वेग ने इस परियोजना का अस्तित्व ही मिटा दिया है। इस घटना के बाद स्थानीय ग्रामीण और किसान सकते में हैं, वहीं संबंधित विभाग चुप्पी साधे हुए है।
खनन के विरोध में पहले भी हुआ था प्रदर्शन
विदित हो कि विगत दिनों बयालीसेरा और तैलीहाट में मानकों के विपरीत हो रहे खनन के खिलाफ ग्रामीणों ने उग्र विरोध प्रदर्शन किया था। जन आक्रोश को देखते हुए प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो स्थानों पर खनन पट्टे निरस्त कर दिए थे। हालांकि, यह राहत अस्थाई साबित हुई।
बदले हुए जलधारा के वेग ने किया खेल
क्षेत्रीय निवासियों के अनुसार, मात्र एक दिन हुई बारिश के बाद गोमती नदी का जलस्तर थोड़ा बढ़ा। खनन के कारण नदी की प्राकृतिक धारा और उसका वेग पूरी तरह बदल चुका था। इसका सीधा असर वहां स्थित सरकारी लघु सिंचाई परियोजना पर पड़ा और आज वह पूरी तरह सूखकर बेकार हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि खनन का तर्क अक्सर यह दिया जाता है कि इससे नदी अपने निर्धारित मार्ग पर बहेगी, लेकिन यहाँ तो खनन ने ही सरकारी संपत्ति को ध्वस्त कर दिया।
पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
इस मामले पर पर्यावरणविद एवं पत्रकार हरीश जोशी ने कहा कि सिंचाई परियोजना का बर्बाद होना पहले से तय था। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंचाई पंप के समीप जिस तरह ताबड़तोड़ अवैध खनन किया गया, उसका यही दुष्परिणाम होना था। यह प्रकृति और सरकारी संसाधनों के साथ खिलवाड़ है।
“जिला प्रशासन और सिंचाई विभाग से मांग है कि जल्द ही परियोजना को पुनर्जीवित किया जाए, अन्यथा वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। हमने प्रशासन को पहले ही आगाह किया था कि पंप के पास खनन परियोजना को तबाह कर देगा, लेकिन हमारी एक न सुनी गई। आज सिंचाई के अभाव में हमारी फसलें बर्बाद होने की कगार पर हैं।” — पूजा मेहरा, ग्राम प्रधान
ग्रामीणों का आरोप है कि खनन निदेशालय की अनुमति में पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है।” परियोजना के नष्ट होने से ग्रामीण हैरान और परेशान हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जब सिंचाई विभाग की योजना पट्टे की जद में थी, तो खनन की अनुमति किसने दी? चूंकि खनन की अनुमति खनन निदेशालय द्वारा जारी की गई थी, इसलिए स्थानीय ग्रामीण अब संबंधित विभाग की खामोशी पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। ग्रामीणों ने उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदारों पर कार्रवाई की मांग की है।


















