विपिन जोशी …
लक्ष्मी आश्रम कौसानी तक सड़क मार्ग निर्माण की मांग वर्षों से लंबित
कौसानी।उत्तराखंड के अल्मोड़ा व बागेश्वर जनपद के सीमांत की सुरम्य वादियों में, समुद्र तल से लगभग 1700 मीटर की ऊंचाई पर बसा है लक्ष्मी आश्रम। महात्मा गांधी की शिष्या कैथरीन मैरी हाईलामन “सरला बहन” ने 5 दिसंबर 1946 को आजादी आंदोलन के दौर में इस आश्रम की स्थापना की थी।वर्तमान में यहां पर 50 से अधिक बेटियां आवासीय औपचारिक व स्वावलम्बन की व्यावहारिक शिक्षा ले रही हैं।पर विडंबना ये है कि गांधी के स्वराज का सपना सींचने वाला यह आश्रम आज एक अदद पक्की सड़क से वंचित है वो भी मुख्य सड़क से मात्र लगभग डेढ़ किमी दूरी की।
कौसानी बाजार से मुख्य बाजार से आश्रम तक पहुंचने के लिए डेढ़ किलोमीटर की सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। यह रास्ता पक्का नहीं है, बारिश में कीचड़ और फिसलन से भर जाता है।
राशन, दवाइयां, निर्माण सामग्री, खादी का माल सब कुछ मजदूरों या आश्रम कार्यकर्तियों के सिरबोझ। से ढोना पड़ता है।
आश्रम की कोई छात्रा या शिक्षक बीमार पड़ जाए , दुर्घटना की स्थिति हो तो स्ट्रेचर या डोली के सहारे ही मरीज को 1.5 किमी नीचे उतारना पड़ता है।सड़क न होने से वाहन व एम्बुलेंस आश्रम तक नहीं पहुंच पाते। चूंकि यह आश्रम अपनी स्थापना के अस्सी साल पार कर चुका है और आश्रम के आजीवन बुनियादी कार्यकर्ता भी नब्बे वर्ष की उम्र के पार हैं। वैश्विक स्तर की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री राधा बहिन भट्ट पिचानब्बे वर्ष की उम्र पर चल रही हैं जिन्हें नियमित स्वास्थ्य परीक्षण हेतु खासी मशक्कत और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी साल आश्रम के दो बुजुर्ग कार्यकर्ताओं क्रमशः डेविड हॉपकिन्स और कांति बहिन भट्ट का बीते दो माह में निधन भी हो चुका है।
सरला बहन का सपना था कि”पहाड़ की बेटियां स्वावलंबी बनें”। आश्रम ने अपने इस स्थापना उद्देश्य के कीर्तिमान भी गढ़े हैं परन्तु आश्रम तक सड़क मार्ग आज भी सपना ही रह गया है
हरीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार – कौसानी को “भारत का स्विट्जरलैंड” कहा जाता है। नंदा देवी, त्रिशूल, पंचाचूली का दृश्य यहां से दिखता है। सड़क बनने से पर्यटक आश्रम तक आएंगे। पर्यावरण शिक्षा, गांधी दर्शन के कार्यक्रम पर्यटकों की पहुंच में होंगे।
बलवंत नेगी, जिला पंचायत सदस्य – सरकारों द्वारा संचालित मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के बावजूद कौसानी मुख्य बाजार से आश्रम तक एक पक्की सड़क का निर्माण न हो पाना भी बड़ा आश्चर्य है जबकि गांव गांवों तक इन योजनाओं सड़कें बनाई जा रही हैं।
नीमा वैष्णव कौसानी – सरला बहन सर्वोदय विचार से प्रभावित हो इंग्लैंड छोड़कर भारत आईं, पैदल चलकर गांव-गांव महिला शिक्षा का अलख जगाई। उनके बनाए आश्रम तक 80 साल बाद भी पक्की सड़क का न होनास्वतंत्र भारत के लिए शर्म की बात है।
राधा भट्ट पदम् श्री

– हमारे प्रयासों से वर्षों पूर्व प्रशासन ने सड़क मार्ग की सर्वे भी कराई थी परंतु फ़ाइल कहां धूल खा रही है इसका कुछ भी अता पता नहीं है।
स्त्री शिक्षा ,पर्यावरण , स्वावलंबन और सामाजिक विकास हेतु सचेष्ट लक्ष्मी आश्रम कौसानी के कार्यों और योगदान के बाद सरकार ने पद्म पुरस्कार देकर आश्रम का मान तो बढ़ाया है परन्तु यातायात सुविधा न होने से आश्रम परिजन नारकीय जीवन जीने को विवश हैं,उम्मीद की जानी चाहिए कि उत्तराखंड के चुनावी वर्ष में कौसानी की इस बुनियादी मांग को पंख लग सकेंगे।


















