विपिन जोशी…
मुनाफे में चल रही इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को क्यों बेच दिया ?
कंपनी की स्थापना 1978 में की गई थी और मुख्य रूप से आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के निर्माण के लिए जानी जाती है। कंपनी के पास 1200 से अधिक दवाओं के निर्माण का लाइसेंस है। कंपनी के निजीकरण का विरोध विपक्षी पार्टी ने खुल कर किया। निजीकरण को लेकर स्थानीय स्तर पर काफी चर्चा और विरोध भी हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र की एक प्रमुख औद्योगिक इकाई थी और इससे स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था जुड़े हुए थे।
इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम थी, जो आयुष मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करती थी।
सरकार ने हाल ही में इसके 100% इक्विटी शेयर और प्रबंधन नियंत्रण को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया पूरी की है। इसे ‘रणनीतिक विनिवेश’ भी कहा जा रहा है।
IMPCL को मेसर्स स्काईमैप फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s. Skymap Pharmaceuticals Pvt. Ltd.) ने लगभग ₹121 करोड़ की उच्चतम बोली पर ख़रीदा है । करीब 33 करोड़ सालाना मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनी को बेचने पर स्थानीय लोगों में भारी नाराज़गी है। विभिन्न संगठनों और राजनैतिक दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है, आने वाले दिनों में रामनगर में बड़ा आंदोलन होने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है ।

क्या बोले माननीय –
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या ने इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, मोहान को बेचने के खिलाफ आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा करते हुए कहा, पूर्व सीएम हरीश रावत के नेतृत्व में केंद्र सरकार के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन किया जाएगा।
एक मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा कि इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, मोहान जब मुनाफे में चल रही थी तो इसे बेचने की आवश्यकता क्यों पड़ गई, स्थानीय लोगों पर अब नौकरी बचाने का संकट भी है। आंदोलन को और भव्य रूप दिया जाएगा, केंद्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है तो प्रदेश में धामी सरकार का असफल नेतृत्व भी एक कारण है।
विभिन्न संगठनों के साथ अब स्थानीय नागरिकों ने आंदोलन को समर्थन देना शुरू कर दिया है। केंद्र सरकार लगातार मुनाफे वाली कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की कवायद शुरू कर चुकी है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सैक्टर को भी कार्पोरेट कंपनियों को देने की रणनीतिक योजना विगत एक दशक से सुचारू है। कुछ नामी एनजीओ शिक्षा में सुधार के बहाने शिक्षा विभाग को पूर्ण रूप से कब्जाने की दिशा में अग्रसर हैं। एक ओर सरकारी सिस्टम को मजबूत करने के खोखले दावे हैं तो दूसरी ओर निजीकरण का खतरनाक खेल भी जारी है, आम जनता के लिए निजीकरण हमेशा से नुकसानदायी रहा है। कार्पोरेट कंपनियों को सस्ते श्रम चाहिए और मुनाफा अधिक ऐसे में स्थानीय लोगों को अपने रोजगार की चिंता होनी जायज है।


















