मजदूर दिवस: संघर्ष का इतिहास और भारत में वर्तमान की हकीकत
विपिन जोशी
हर साल 1 मई को दुनिया भर में ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ या ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन केवल एक छुट्टी नहीं है, बल्कि लाल झंडों और गगनभेदी नारों के बीच उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद करने का दिन है, जिसने आधुनिक श्रम कानूनों की नींव रखी। राष्ट्र निर्माण की नींव में अपना खून-पसीना सींचने वाले करोड़ों कामगारों के सम्मान और उनके अधिकारों के प्रति एकजुटता प्रकट करने का यह एक वैश्विक अवसर है।
संघर्ष से उपजा इतिहास: शिकागो से चेन्नई तक
मजदूर दिवस की जड़ें 19वीं सदी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्रांति के दौरान हुए भीषण शोषण में छिपी हैं। उस समय मजदूरों से दिन में 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था, कार्यस्थल असुरक्षित थे और वेतन बेहद कम था।
शिकागो का हेमार्केट अफेयर: इस शोषण के खिलाफ सबसे मुखर आवाज 1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो में गूंजी। हजारों मजदूरों ने ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन’ की मांग को लेकर ऐतिहासिक हड़ताल की। 4 मई को शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में एक शांतिपूर्ण सभा के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फेंक दिया, जिसके बाद पुलिस ने अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हिंसा में कई मजदूर और पुलिसकर्मी मारे गए। इस संघर्ष और बलिदान की याद में, 1889 में ‘इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस’ ने 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।
भारत में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत विश्वव्यापी आंदोलन के काफी समय बाद हुई। 1 मई 1923 को मद्रास (अब चेन्नई) में ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ ने पहली बार लाल झंडा फहराकर मई दिवस मनाया। प्रसिद्ध साम्यवादी नेता सिंगारवेलु चेट्टियार ने इसका नेतृत्व किया था।
एक सदी से अधिक समय बीतने और कई श्रम कानूनों के बनने के बाद, आज जब हम 21वीं सदी के भारत में मजदूरों की स्थिति का आकलन करते हैं, तो एक विरोधाभासी तस्वीर सामने आती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे करोड़ों हाथों की बेबसी भी छिपी है।
भारतीय श्रम बाजार की सबसे बड़ी हकीकत इसका असंगठित क्षेत्र है। देश के लगभग 90% से अधिक श्रमिक इसी क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें कृषि मजदूर, निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी वाले और अब ‘गिग इकोनॉमी’ (जैसे डिलीवरी पार्टनर्स) के श्रमिक शामिल हैं।
असंगठित क्षेत्र के अधिकांश मजदूरों के पास पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या भविष्य निधि (PF) जैसी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। ग्रामीण भारत के लिए आजीविका का एक बड़ा सहारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) है। लेकिन यह योजना भी चुनौतियों से मुक्त नहीं है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में मनरेगा के तहत दर्ज कुल पंजीकृत श्रमिकों की संख्या लगभग 24.6 करोड़ (वित्त वर्ष 2024-25 तक) है। इनमें से लगभग 12.8 करोड़ सक्रिय श्रमिक हैं। जनगणना के बाद यह आंकड़ा बदल जाएगा ।

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी मनरेगा मजदूरों के सामने भुगतान में देरी एक गंभीर समस्या है। हालिया आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में वर्ष 2023 से अब तक (वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 का बकाया) लगभग 1.5 लाख से अधिक मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है। करोड़ों रुपये की यह देनदारी केंद्र सरकार से फंड मिलने में देरी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण लंबित है, जिससे हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
निर्माण स्थलों और कारखानों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण अक्सर दुर्घटनाएं होती हैं। वहीं, रोजगार की तलाश में करोड़ों मजदूर अपना गांव-घर छोड़कर शहरों की ओर पलायन (प्रवासन) करने को मजबूर हैं।
अतः मजदूर दिवस केवल अतीत के संघर्षों के जश्न का दिन नहीं है, बल्कि यह वर्तमान की चुनौतियों से आंख मिलाने का भी दिन है। भारत को यदि वास्तव में एक विकसित और समावेशी राष्ट्र बनना है, तो राष्ट्र निर्माण में लगे सबसे कमजोर तबके—मजदूरों—को उनका हक, सम्मान और सुरक्षा देनी ही होगी। केवल नारे लगाने से स्थिति नहीं बदलेगी; ठोस नीतियां और उनका प्रभावी कार्यान्वयन (जैसे मनरेगा में समय पर भुगतान सुनिश्चित करना) आवश्यक है। जब तक देश का अंतिम मजदूर सामाजिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करता, तब तक तरक्की के सारे दावे अधूरे हैं। ‘स्वर स्वतंत्र’ के मंच से, आइए हम सब मिलकर एक ऐसे भारत का संकल्प लें जहां पसीने की हर बूंद को उसका सही मूल्य और सम्मान मिले।


















