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हिमालय की जड़ मत खोदो

विपिन जोशी…

पदमश्री राधा भट्ट से बातचीत के आधार पर

हिमालय दिवस पर पदमश्री राधा भट्ट ने हिमालय पर पड़ रहे दबाव को विनाशकारी मानते हुए कहा कि हम सब हिमालय की जड़ खोदने में लगे हैं। इसमें सभी शामिल हैं। सरकार की हिमालय विरोधी नितियां हो या आम जन की विलासितापूर्ण जीवन शैली। हिमालय है तो हमारा भी अस्तित्व है, बिना हिमालय के हमारे जीवन की कल्पना भी कठिन है। हिमालय को भी रक्षा चाहिए। हमने कहा टिहरी बांध मत बनाओं उससे आसपास की नदियां और पहाड़ प्रभावित होंगे तब हमें विकास विरोधी कहा गया। आज धराली और यमुना घाटी और कपकोट की आपदा हमारे सामने हैं। नदियों में बाढ़ आई बहुमंजिला मकान गिर गए। जान माल की हानि हुई। मुझे अब सरकारों पर भरोसा नहीं। सरकारें कैसा विकास कर रही है ? जनता को निर्भय होकर अपने विकास की पठकथा स्वयं लिखनी होगी। उत्तराखण्ड में पर्यटन के नाम पर बेतहाशा लोग आ रहे हैं इसका असर हिमालय में बोझ बढ़ा रहा है। जितने घाव आप हिमालय को देंगे हिमालय विभिन्न प्रकार की आपदाओं के रूप में उन घावों की टीस को लौटाएगा। हमने केदारनाथ आपदा से भी सबक नहीं लिया। सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में बड़े बांधों का विरोध किया गया था। हिमालय बचाने की सबसे बड़ी मुहिम थी। लेकिन सत्ता और कारपोरेट जगत की मिली भगत ने हिमालय में सिर्फ लूट मचाने का काम किया। आम जनता को विस्थापन का अकूत पैंसा और जमीन देहरादून के आसपास मिला लेकिन इसका असर गंगा और सहायक नदियों में पड़ना शुरू हो चुका है। आज समाचार पत्रों में स्कूल के बच्चे हिमालय की सपथ लेते दिख रहे हैं। जागरूकता अभियान तो ठीक है लेकिन इस अभियान को प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर पर अपने जीवन में ढालना होगा। कथनी और करनी के विभेद को कम करना होगा।

हिमालय से जुड़े प्रत्येक सवाल पर राधा दीदी ने अपने उदगार प्रकट किए। आपने उत्तराखण्ड के हिमालयी क्षेत्र में बन रही रेल योजना पर सवाल दागे। हिमालय के कमजोर पहाड़ों पर अंदरूनी विस्फोट से सुरंग बना कर अंततः पहाड़ों को कमजोर और खोखला किया जा रहा है। यह तो सुरंग बांध से भी ज्यादा भयावह है। बर्फानी नदियों को कैद करना, पहाड़ों को खोखला करना, अनियंत्रित दोहन और अवैज्ञानिक खनन से पहाड़ को लूटना, सड़को के नाम पर भूस्खलन को बढ़ावा देना और वनों का अंधाधुंध दोहन करना ही विकास है तो ऐसे विकास की समीक्षा करे सरकार। एनजीओ के लोग भी एक मत बनाए और गंभीरता से सोचे जरूरत पड़ने पर निकले सड़को पर और हिमालय को बचाने आगे आए। आज हर गॉव को सड़क चाहिए जहां जरूरत है वहां तो ठीक है पर अनायास ही हर गॉव को सड़क से जोड़ना क्यों जरूरी है ? पैदल चलना भूलेंगे तो कई तरह की बिमारियों से ग्रस्त भी होंगे। उद्यम और सहजीवन का विचार ही पहाड़ और हिमालय को बचाएगा। पैदल नहीं चलेंगे तो पदयात्रा कैसे करेंगे, स्वस्थ्य समाज की कल्पना मौजूदा विकास के साथ नहीं होगी। विकास की अवधारणा को बदलना होगा, सरकार नहीं बदलेगी जनता को बदलना होगा।

जितनी विलासिता बढ़ेगी उसी अनुपात में प्रकृति अपना नुकसान पूरा करेगी और हिमालय भी गरजेगा आफत बन कर आसमान बरसेगा। गंगोत्री मार्ग पर ऑल वेदर रोड के लिए हजारों वृक्षों की बलि दे दी गई। देश के अन्य हिस्सों में भी सड़क और कॉलोनी निर्माण के लिए वनों का कटान आम प्रचलन हो चुका है। यह सब बिल्डरों और सरकार की आपसी जुगत का नतीजा है जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधि और नागरिक भी शामिल रहते हैं। हिमालय बचाओं अभियान साल में एक दिन या एक सप्ताह मनाने से कितना असर होगा यह अगल बात है लेकिन इस महान विचार को जीना और अपनी जीवन शैली में अपनाना ही एक मात्र विकल्प है। सरकारें ऐसा नहीं करेंगी उनको चुनाव जीतने में धन की आवश्यकता होती है और धन कारपोरेट जगत से तथा विदेशी फंडिग से आता है जिनका मूल काम ही प्राकृतिक संसाधनों की लूट से मुनाफा कमाना है। ऐसे में सरकारें बडे़ बांधों और सुरंग रेल परियोजना की वकालत क्यों न करें। सरकार के वैज्ञानिक भी अब कहने लगे हैं कि हिमालय का अस्तित्व खतरे में हैं, हिमालय में बन रही कृतिम झीलें विनाशकारी हैं। रेलवे का लुत्फ वाया सुरंग लेंगे तो विनाश ही होगा। हिमालय अभी भी कमजोर और शिशु पर्वत है इसमें बोझ पड़ेगा तो विनाश ही होगा। स्वयं सेवियों की टोलियां गॉव-गॉव जाकर लोगों को समझाए कि मौजूदा विकास नहीं चाहिए। हिमालय के लिए स्थानीयता आधारित विकास चाहिए।

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